Short Story In Hindi आज रचना की शादी थी ! 2025

Short Story In Hindi

आज रचना की शादी थी, उसने एक बार चारों तरफ नजर घुमाकर देखी। शानदार इंतजाम था। ऐसी शानो शौकत वाली शादी करना। उसके माँ बाप सोच भी नहीं सकते थे। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी, स्कूल शिक्षिका थी और उसकी शादी जीस इंसान से हुई थी।

वह अमीर ही नहीं बहुत अमीर कहा जा सकता है। पांच सितारा होटल में उसकी शादी एक परिकथा के समान हो रही थी, वैसा पानी की तरह बहाया गया था, पर उसका पति अशोक उससे तो बस वह 2 दिन पहले ही मिली थी। इतनी जल्दबाजी में उसकी शादी क्यों हो गई?

वे समझ नहीं पा रही थी पर अपने माता पिता से पूछने का समय भी उसे नहीं मिला। रचना 28 वर्ष की हो गई थी और एक प्राइमरी स्कूल में थी। एक आम सी जिंदगी बिताना उसे बहुत पसंद था। जब उसे महंगे जूते सस्ते में मिल जाते तो बड़ी खुश हो जाती।

छोटी छोटी दुकानों पर जाकर भाव करके सामान लेना उसे बहुत पसंद था। पर वह जानती थी उसकी शादी जीस घर में हो रही है। माँ ये सब करना उसके लिए मुमकिन नहीं था। तभी अचानक एक आवाज से उसका ध्यान आकर्षित हो जाता है। वह अशोक था, उसका पति।

उसे अपनी शादी पर चंद शब्द कहने के लिए माइक दिया गया था। अशोक ने कहा तो आखिरकार मेरी शादी हो ही गई। उसके घर के लोग पीछे खड़े ज़ोर से हंसने लगे। रचना को यह सब कुछ अजीब लगी, लेकिन मैं करती भी क्या? वह भी धीरे से मुस्कुरा दी।

फिर अशोक ने ढेरों ऐसे लोगों के नाम गिनाए जिन्हें रचना जानती भी नहीं थी और अशोक ने उन्हें शादी करवाने के लिए धन्यवाद दिया। अंत में उसने अपने परिवार को धन्यवाद दिया और स्टेज से नीचे उतर आया। रचना असमंजस की स्थिति में थी।

उसने तो रचना का नाम ही नहीं लिया, ना ही उसे स्टेज पर बुलाया। यह कैसा नीरज पति मिला था उसे क्या यह रिश्ता अशोक के लिए अनचाहा था? उधर अशोक स्टेज से उतर कर सीधे अपने दोस्त राघव के पास चला गया। उसके संग बैठकर शराब पीने लगा। राघव और अशोक।

Short Story In Hindi मैं दो बेटियों की माँ हूँ !

दोनों आपस में हँसी मजाक कर रहे थे, तभी यह अशोक थोड़ा गंभीर हो गया और बोला राघव वह कांट्रैक्ट मैंने अच्छे से पढ़ा है। राघव अशोक की तरफ़ बड़े ध्यान से देखने लगा। वह जानता था कि वह किस कांट्रैक्ट के बारे में बातें कर रहा है।

पापा ने मेरे लिए कोई विकल्प नहीं छोरा है, मैं उसे तलाक नहीं दे सकता, सिर्फ वह चाहेगी तभी हमारा तलाक हो सकता है। राघव अशोक की तरफ बड़े गौर से देखने लगा तू ये क्या बात कर रहा है? आज ही तेरी शादी हुई है और तू तलाक की बात कर रहा है।

अभी तो तुने रचना को जाना भी नहीं है। शायद तुझे अच्छी लग जाए और तू बाकी की जिंदगी उसके साथ गुजारना चाहे नहीं, राग अप तू नहीं जानता यह कंचा रिश्ता है, बहुत दिनों तक नहीं चलेगा और तू क्या समझता नहीं?

एक तो मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की ने मुझसे शादी क्यों की? सोच पैसों के लिए तो वह तलाक देने के लिए भी आसानी से राजी हो जाएगी। वैसे भी मेरे पिता ने यह शादी मेरे ऊपर थोप दी है। सिर्फ दो दिनों के अंदर शादी करने के लिए कौन सी लड़की तैयार हो जाती है?

मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ ऐसी लड़कियों को टीचर है ना स्कूल में बहुत होशियार है चल कोई बात नहीं, मैं उससे जल्दी छुटकारा पा जाऊंगा। थोड़ी देर में खाने की सुगंध उठने लगी खाने की मेज पर।

बहुत तरह के व्यंजन सजे थे, पर रचना की भूख जैसे खत्म हो गई थी। उसके मन में एक अनजान शंका बैठ गई थी। तभी उसे बड़ी अच्छी सी सुगंध आती है। वह देखती है की उसके बगल की कुर्सी पर अशोक बैठा है। अशोक को उसने पहली बार इतने करीब से देखा था, उसकी घनी पलके थी।

सुघटित शरीर घुंघराले बाल। तभी किसी ने उससे कहा कुछ खा लो बेटा उसने देखा उसकी सांस खाना सर्व करवा रही है, कुछ खा लो कल सुबह 6:00 बजे ही तुम लोगों की फ्लाइट है, तुम्हें जल्दी उठना होगा सुबह 6:00 बजे की फ्लाइट से रचना।

हनीमून पर जाना था पर वह जा कहाँ रही है उसे ये तक नहीं मालूम था। कोई घंटे डेढ़ घंटे के बाद रचना एक अनजान कमरे में अनजान लोगों के बीच एक अनजान घर में थी। अपना फ़ोन देखते देखते कब उसकी आंख लग गई, उसे पता भी नहीं चला।

तभी दरवाजे पर खटखटाने की आवाज आई तो वह चौंक कर उठ गई। उसकी सांस आई थी, उसने कहा अरे बेटा जल्दी से कपड़े चेंज कर लो, अशोक तैयार होकर तुम्हारा इंतजार कर रहा है।

ने जल्दी से अपनी शादी का जोड़ा उतार कर रखा और एक हल्की सी लाल रंग की साड़ी पहनी। उसके साथ मेल खाते गहने पहने। फिर उसने अपना सामान उठाया और नीचे डैंग रूम में चली गई। अशोक उसे देखते ही उठ खड़ा हुआ और गाड़ी की तरफ चल दिया।

रचना भागते भागते उसके पीछे गई। रास्ते में रचना ने अशोक से कई बार बात करने की कोशिश की, पर अशोक ने उसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। रचना की क्लास में भी ऐसे कई शर्मीले बच्चे थे जो ज्यादा बात नहीं करते थे।

और उनसे बार बार बात करने की कोशिश करने पर नाराज हो जाते थे या रोने लगते थे। रचना ने समझा कि अशोक भी कुछ शर्मीले किस्म का है और उससे ज्यादा बात करना ठीक नहीं समझा। एअरपोर्ट जाने पर रचना को मालूम हुआ कि वे मुंबई जा रहे हैं।

मुंबई से उसकी बड़ी मीठी यादें जुड़ी थीं। कुछ साल पहले जब वह अपनी मौसी के पास मुंबई गई थी तो उन लोगों ने चौपाटी पर बहुत मस्ती की थी और फिर वह गेटवे ऑफ इंडिया भी देखने गए थे। वहाँ पर सबका मन हुआ था कि रात का खाना वह होटल ताज में खाएं।

पर पांच सितारा होटल में खाना खाने की हैसियत उसके परिवार की नहीं थी, पर मुंबई से उसे लगाव हो गया था। आज मुंबई जाने के नाम पर वह बहुत खुश थी। एअरपोर्ट से उतर कर वह दोनों टैक्सी में बैठ कर होटल तक जा रहे थे तो रास्ते में दोनों की आंख लग गई। जब गाड़ी रुकी।

तो देखा कि वह होटल ताज के बाहर खड़े हैं। उनका कमरा उसी में भूख था। रचना का जैसे सपना पूरा हो गया। वह वह बहुत खुश थी पर वह अपनी खुशी ज़ाहिर किस्से करें। अशोक से अशोक उसे छोड़कर आगे चल दिया था। रचना उसके पीछे भागते भागते होटल के कमरे में गई थी।

Short Story In Hindi मैं रात को सो रही थी कि अचानक मुझे एहसास हुआ कि कोई मुझे मैं उनको पीछे से….!

होटल के कमरे में जाते ही अशोक ने टीवी ऑन किया और ना जाने कौन सी खबरें देखने लगा। खिड़की के बाहर समुद की लहरों पर सूरज की किरणें चमक रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी लहरों पर हीरे चमक रहे हो। अशोक का फ़ोन आ गया।

और किसी से गंभीरता से बात करता हुआ कमरे के बाहर चला गया। रचना अपने सपनों के सैर को देखने में मगन थी। उधर अशोक किसी से फ़ोन पर कह रहा था मुझे जल्दी से जल्दी यहाँ से बाहर निकलना है, कोई मीटिंग फिक्स करो, मुझे घुटन हो रही है इसके साथ रहने में।

अशोक ने जल्दी से कैब बुक की और अपने मुंबई के ऑफिस में चला गया। उसे मन ही मन रचना की याद एक पल को आई पर उसने तुरंत अपना मन हटा लिया। सच उस ला सीफोन की साड़ी में रचना किसी अफसर से कम नहीं लग रही थी और उस पर उसकी वह मुस्कान।

जो किसी का मन मोह ले। अशोक को शादी जैसे रिश्ते पर विश्वास ही नहीं था। उसने अपने पिता का तीन बार तलाक होते देखा था। छोटी छोटी बातों पर उसके माता पिता की बहस हो जाती और नौबत तलाक तक पहुँच जाती। उसके बाद अशोक के पिता ने पुनर्विवाह किया पर शादी टूट जाती।

अशोक जानता था कि पैसे रिश्तों से अधिक मजबूत चीज़ है। उसने मन मन में निश्चित किया कि वह दिन भर ना तो रचना को फ़ोन करेगा और ना ही उसका फ़ोन रिसीव करेगा। रात तक वह गुस्से से आग बबूला हो जाएगी। बस कुछ ही दिनों में उसका तलाक हो जाएगा।

और वह आजादी की जिंदगी जी पाएगा पर 26 नवंबर 2008 की शाम उसके भाग्य में कुछ और ही लिख कर आई थी और उस दिन वह हो गया जो होना नहीं चाहिए था। 26 नवंबर 2010 आज उस घटना को 2 साल बीत चूके हैं अशोक किताबों की दुकान से।

को चुनिंदा किताबें खरीद रहा है। फिर वह एक साड़ी की दुकान पर जाता है और लाल रंग की दो साड़ियां खरीदता है। गाड़ी में बैठ कर ड्राइवर से कहता है कि सती माता के मंदिर चलो तभी उसका मोबाइल बंद होता है। उसके पापा का कॉल था। अशोक कहाँ हो?

पापा मैं मंदिर से सीधे अस्पताल जाऊंगा, दोपहर तक ऑफिस आ जाऊंगा अशोक मुझे तुम्हारी जरूरत है उसे भूल जाओ अबे कभी भी पापा बस करो आगे कुछ मत कहना मैं आता हूँ। मंदिर में जाकर अशोक एक साड़ी माता को अर्पित करता है।

और दूसरी वापस लेकर अस्पताल आ जाता है। उसके एक हाथ में किताब थी, दूसरे में साड़ी रचना पुकारना हुए। अस्पताल में के कमरे में दाखिल होता है रचना वह बिस्तर पर लेटी थी, उसके शरीर पर ढेरों तार मशीनों से जुड़े, वह कोमा में है।

2 साल से अशोक बैठ जाता है, किताब खोल पढ़ना शुरू करता है तभी वह नर्स आती है। अशोक उसको लाल साड़ी देता है और कहता है इसे रचना को पहना देना। प्लीज़ आज सेकंड एनिवर्सरी है। हमारी बड़े प्यार से, रचना के माथे पर हाथ फेरता है।

और उसे निहारने लगता है। बस एक बार आँखे खोल दो मेरी जान मैं तुम्हें कभी दूर नहीं जाने दूंगा, तभी वह रागव आ जाता है। अशोक का पुराना दोस्त अशोक को वह मोबाइल में एक वीडियो दिखाता है जो 2 साल पहले उस घटना की थी जिसने अशोक की जिंदगी बदल दी थी।

यह देखो। इसमें रचना भी दिख रही है। अशोक ध्यान से देखने लगता है। वीडियो ताज होटल के सीसीटीवी की थी रचना तेजी से भागती नजर आई और गोली चलने की आवाज आती है अशोक को सारे दृश्य जीवंत दिखने लगते हैं 2 साल पहले का दिन।

जब अशोक ने दिन भर रचना को फ़ोन नहीं उठाया था और रात 8:00 बजे होटल पहुंचा था, उसने सोच लिया था कि रचना गुस्से में उसे उल्टा सीधा बोलेंगे तो वह सारी बातें रिकॉर्ड कर लेगा, जिससे तलाक मिलने में आसानी हो। होटल पहुंचा तो नीचे कैफे के पास से किसी ने पुकारा।

अशोक अशोक ने पलट कर देखा तो रचना किसी औरत के साथ खड़ी मुस्कुरा रही थी, रर्चना की मौसी थी। वह उनकी शादी में नहीं आ पाई थी इसलिए मिलने आ गई थी। उसने आखिरी बार रचना को मुस्कुराते देखा था क्योंकि उसके बाद सब कुछ बदल जाने वाला था।

अशोक दो कॉफी ऑर्डर करता है और सोचता है कि वह रचना से साफ साफ बात कर लेगा। साढ़े आठ के ऊपर हो चूके थे। अचानक दरवाजे की तरफ रचना अपलग देखने लगती है और तेजी से उठकर अशोक का हाथ पकड़कर वहाँ से चलने को कहती है। अशोक हड़बड़ा जाता है।

तभी वह जब पीछे पलटते हैं तो गोली चलने की आवाज से उनकी रूह कांप जाती है। वहाँ दो आतंकवादी तेजी से लोगों पर गोलियां चला रहे थे और खून से लगभग लोग जमीन पर गिरते जा रहे थे। अशोक और रचना वहीं एक दीवार की होठ में चिपके खड़े हो जाते हैं।

तभी एक छोटा सा बच्चा वहाँ तेजी से भागता है। रचना अपनी जान की परवाह ना करते हुए बाहर निकलती है और उस बच्चे को गोदी में उठाकर वापस भागती है। कुछ भी हो सकता था रचना को इस तरह अपनी जान जोखिम में डालते देख।

अशोक उसे एक तक देखता रह जाता है। एक पराये बच्चे के लिए इसने अपनी जान जोखिम में डाल दी। बच्चे को गोद में लिए रचना तेजी से भागने लगती है। उसे सारे रास्ते अच्छे से पता थे। उसने बताया की आज सारा दिन वह होटल में घूमती रही थी।

इस होटल की उससे अच्छे से पहचान हो गई थी। इस होटल में दो भींग है, एक ताज टावर है जहाँ वे लोग रुके हैं और दूसरा भींग है जहाँ पर भी कई मेहमान रुके हैं। तभी पीछे से बंटी बंटी की आवाज़ आती है तो रचना देखती है की बच्चे के माँ उसे पुकारना हुए दौड़ रही है।

रचना बच्चे को उनके माँ बाप को सौंप देती है। बच्चे के माँ बाप की आँखों से आंसू छलक जाते हैं। वह रचना को बार बार धन्यवाद करने लगते हैं। अशोक यह सब चीजें बड़े ध्यान से देख रहा था। रचना अशोक का हाथ छोटे बच्चे की तरह पकड़कर इधर से उधर भगाई ले जा रही थी।

उनका कमरा छठी मंजिल पर था। जब तक वे मंजिल पर पहुँचते है वह आग लग चुकी होती है। अशोक घबरा जाता है। इसके विपरीत रचना अपना हौसला बनाए रखती है। वहीं पर एक स्टोर रूम के अंदर वे छुप जाते है और पूरी रात उसी स्टोर रूम में काटती है वहाँ।

810 और लोग भी छुपे थे। होटल पर हमला हुए 24 घंटे बीत चूके हैं क्या बाहर हो रहा है उन लोगों को कुछ नहीं पता, कभी कभी कॉरिडोर में हलचल होती है, फिर शांति छा जाती है। तीसरे दिन उसे वहाँ पर पुलिस के होने का एहसास होता है।

पुलिस वाले आवाज़ दे रहे थे की अब सब कुछ ठीक है, हालत काबू में है। सब बाहर आ जाये। रचना, अशोक और वहाँबंद सारे लोग बाहर निकलते है। पुलिस बारी बारी से उन्हें बाहर लेकर जा रही होती है। तभी सामने से दो आतंकवादी आ जाते है जिनके हाथो में

बड़ी बंदूकें थीं और वे बंदूक अशोक की तरफ तान देते हैं। अशोक डर से ठंडा पड़ जाता है, अशोक को गले से पकड़ के खींचते हैं, आतंकवादी अपने पास ले जाते हैं। कहते हैं कि अगर किसी ने कुछ करने की कोशिश की तो वे इसे मार देंगे।

अशोक को घसीटते हुए वह ले जा रहे थे। पुलिस भी वहीं रुक जाती है। पर रचना में न जाने कहाँ से शक्ति आ जाती है वहीं से शेर की तरह दौड़ती है और चिल्लाते है छोड़ दो मेरे पति को रचना को इस तरह से दौड़ता देख कर अशोक को साथ साथ में देवी रूप लगती है।

शायद इसी तरह सती माता ने यमदूत से अपने पति के प्राण हर लिए होंगे। अशोक पुरानी यादों में डूबता जा रहा था तभी अचानक उसके मोबाइल की घंटी बजी, जिससे उसकी यह याद टूट गई। उसके पापा का फ़ोन था, उसने फ़ोन उठाकर कहा।

बस मैं निकल रहा हूँ, लेकिन अशोक के पापा काफी गुस्से में थे। वह बोले, मैंने ही तुम्हारी शादी कराई थी और मैं ही कह रहा हूँ कि अब तुम उसे छोड़ दो भाई एक जिंदा लाश है, वह कभी भी कोमा से बाहर नहीं आएगी। तुम मेरे इकलौते लड़के हो। बिज़नेस में तुम्हारी जरूरत है।

तुम क्यों उसके पीछे अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हो? 2 साल बीत चूके हैं जब अब होश में न आई तो क्या आएगी? अशोक के सब सुनकर बहुत दुखी हो जाता है और फ़ोन काट देता है। वह अनमने मन से उठता है और रचना के माथे को चूम कर कहता है हैप्पी एनिवर्सरी डियर।

अशोक की आँखे भीग जाती है और वह तेजी से हॉस्पिटल से बाहर आ जाता है। गाड़ी में बैठ कर अशोक भीगी पलकों से गाड़ी के बाहर देखने लगता है। उसे याद आता है किस तरह उस आतंकवादी ने जब उसे झकन लिया था तो अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए?

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रचना उस पर कूद पड़ी थी। तभी दूसरे आतंकवादी ने रचना पर गोली दाग दी थी। गोली रचना की रीढ़ की हड्डी में जा लगी थी और वह अशोक के ऊपर गिर गई थी। जब अशोक ने उसकी पीठ पर हाथ रखा था तो रचना के खून से अशोक के हाथ रंग गए थे।

तभी बहुत तेज गोली चलने की आवाज आई थी और पुलिस ने दोनों आतंकवादियों को गोलियों से भूनकर वहीं मार गिराया था। रचना ने अपनी हिम्मत से अशोक की ही नहीं वहाँ मौजूद बहुत सारे लोगों की जान बचाई थी। पर वह कुछ जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। इन दो सालों में।

अशोक ने न जाने कितने ताने सुने, कितने ही लोगों ने उससे रचना को छोड़कर आगे बढ़ जाने को कहा। एक वैशाम थी जब अशोक रचना से छुटकारा पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था और आज यह दिन है कि अशोक जो कभी मंदिर की सीढ़ियों पर नहीं चढ़ा।

वह मंदिर मंदिर जाकर रचना की सलामती की दुआ मांगता है, तभी अशोक के फ़ोन की घंटी दोबारा बजती है। हॉस्पिटल से फ़ोन था अशोक घबरा जाता है। इन दो सालों में कई बार रचना क्रिटिकल सिचुएशन में पहुँच गई थी। कभी उसकी हार्टबीट बिल्कुल स्लो हो जाती थी।

तो कभी बहुत तेज अशोक ने कितने ही बड़े बड़े डॉक्टरों से उसका इलाज कराकर किसी तरह उसकी सांसों को चलते रखा था। वह घबरा गया। उसने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं कि वह रचना को हमेशा के लिए खो देगा? उसके मन में जो रचना के साथ जिंदगी जीने खींचा है?

वहीं खत्म हो जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो अशोक फिर कभी किसी से प्यार नहीं कर सकेगा क्योंकि उसे प्यार नहीं उसे रचना से अब मोहब्बत हो गई थी। बस सीढ़ियों से भागते हुए रचना के रूम में पहुंचता है तो बैड खाली था।

वह पागलोसा हॉस्पिटल में इधर उधर भागते जा रहा था की तभी उसे रचना के डॉक्टर दिखाई देते हैं, जो बहुत तेजी से आगे बढ़ते जा रहे थे। अशोक जब उनको देखता है तो वह उसे कहते हैं रिलैक्स अशोक एक खुशखबरी है। रचना के हाथों ने हल्की सी हरकत की थी।

जब नर्स उसकी ड्रेस चेंज कर रही थी तो उसने हल्के से नर्स का हाथ थामा था। ये बहुत अच्छा रिस्पांस है और हमें लगता है रचना अब जल्दी रिकवर करेगी। अशोक वहीं कुर्सी पर बैठ जाता है। उसकी आँखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वह रचना।

जब उसे मुस्कुरा कर देखती थी तो वह अपना मुँह घूमा कर बाहर देखने लगता था। वह उसकी मुस्कान देखने के लिए ऐसे तड़प रहा था जैसी तड़प शायद ही राजा में रही हो। शीरन फराद में रही हो वही मोहब्बत जो रोमियो को जूलिएट से हो गई थी, वैसे ही मोहब्बत।

अशोक को रचना से थी। 31 दिसंबर 2010 अशोक बेसब्री से पल पल रचना के आने का इंतजार कर रहा था। रचना पूर्णतः सवस्थ हो गई थी और आज यह हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर घर आ रही थी। अशोक सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट चायता था इसलिए।

वह घर पर ही रचना के आने का इंतजार कर रहा था। उसने सारे घर को रचना के पसंदीदा फूल रजनीगंधा से सजवाया था। रसोई में सब कुछ रचना की पसंद का बन रहा था। रचना की अलवारी में अशोक ने ना जाने कितने जोड़े बनवा कर रखे थे।

उसने क्या कुछ नहीं सहेज कर रखा था। उसके लिए इन दो सालों में अशोक पल पल सिर्फ रचना के लिए ही जी रहा था। घर पर रचना के मम्मी, पापा, भाई, बहन, उसकी मौसी और कई सहेलियों को भी उसने बुलाया था। अशोक के पापा मम्मी रचना को लेकर हॉस्पिटल से आते हैं।

दरवाजे पर रचना की आरती उतारी जाती है और रचना, सौभाग्य और धन की देवी का स्वरूप लिए कलश में चावल को पैरों से अंदर को ढकेलकर प्रवेश करती है। आज रचना को बगैर उस घर के लोग और वो कमरा कुछ भी पाराया नहीं लग रहा था।

वह सब तो जनम जनम से उसके अपने थे सरागर रचना के आने की खुशी में सराबोर था रचना उसकी निगाहें तो अशोक पर थी और अशोक की रचना पर अशोक की घनी पलके भोंघराले बाल और मधुर मुस्कान रचना को अपनी और खींच ले रहे थे।

रचना अपने पापा मम्मी को देख कर बहुत खुश हुई। उसकी खुशी में अशोक की खुशी और बढ़ गई। जब रचना मुस्कुराती तो अशोक उसकी मुस्कराहट में खो जाता। वह हर पल उसे देखना चाहता था। उसकी हर मुस्कान को वह अपनी जिंदगी में भर लेना चाहता था।

हर पल और सोप उसके साथ जीना चाहता है हर पल।

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